भगवान्के कृपापूर्ण स्पर्शसे उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो गये। उसने भगवान्की परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और सबके देखते-देखते अपने लोककी यात्रा की॥ ५॥✎ 670
सोऽनुकम्पित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम्।
लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्तकिल्बिषः॥ ५
भगवान्के कृपापूर्ण स्पर्शसे उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो गये। उसने भगवान्की परिक्रमा करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और सबके देखते-देखते अपने लोककी यात्रा की॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.4.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 920) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/4/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)