॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.16
यदा दुर्वाससः शापात् सेन्द्रा लोकास्त्रयो नृप।
निःश्रीकाश्चाभवंस्तत्र नेशुरिज्यादयः क्रियाः॥ १६
yadā durvāsasaḥ śāpāt sendrā lokāstrayo nṛpa|
niḥśrīkāścābhavaṃstatra neśurijyādayaḥ kriyāḥ|| 16
अर्थ
दुर्वासाके शापसे* तीनों लोक और स्वयं इन्द्र भी श्रीहीन हो गये थे। यहाँतक कि यज्ञ-यागादि धर्म-कर्मोंका भी लोप हो गया था॥ १६॥ यह सब दुर्दशा देखकर इन्द्र, वरुण आदि देवताओंने आपसमें बहुत कुछ सोचा-विचारा; परन्तु अपने विचारोंसे वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ १७॥ तब वे सब-के-सब सुमेरुके शिखरपर स्थित ब्रह्माजीकी सभामें गये और वहाँ उन लोगोंने बड़ी नम्रतासे ब्रह्माजीकी सेवामें अपनी परिस्थितिका विस्तृत विवरण उपस्थित किया॥ १८॥ ब्रह्माजीने स्वयं देखा कि इन्द्र, वायु आदि देवता श्रीहीन एवं शक्तिहीन हो गये हैं। लोगोंकी परिस्थिति बड़ी विकट, संकटग्रस्त हो गयी है और असुर इसके विपरीत फल-फूल रहे हैं॥ १९॥
टिप्पणियाँ
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यह प्रसंग विष्णुपुराणमें इस प्रकार आया है। एक बार श्रीदुर्वासाजी वैकुण्ठलोकसे आ रहे थे। मार्गमें ऐरावतपर चढ़े देवराज इन्द्र मिले। उन्हें त्रिलोकाधिपति जानकर दुर्वासाजीने भगवान्के प्रसादकी माला दी; किन्तु इन्द्रने ऐश्वर्यके मदसे उसका कुछ भी आदर न कर उसे ऐरावतके मस्तकपर डाल दिया। ऐरावतने उसे सूँड़में लेकर पैरोंसे कुचल डाला। इससे दुर्वासाजीने क्रोधित होकर शाप दिया कि तू तीनों लोकोंसहित शीघ्र ही श्रीहीन हो जायगा।