यह सब दुर्दशा देखकर इन्द्र, वरुण आदि देवताओंने आपसमें बहुत कुछ सोचा-विचारा; परन्तु अपने विचारोंसे वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ १७॥
निशाम्यैतत् सुरगणा महेन्द्रवरुणादयः।
नाध्यगच्छन्स्वयं मन्त्रैर्मन्त्रयन्तो विनिश्चयम्॥ १७
यह सब दुर्दशा देखकर इन्द्र, वरुण आदि देवताओंने आपसमें बहुत कुछ सोचा-विचारा; परन्तु अपने विचारोंसे वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.5.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 924) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/5/17/