श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.50

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नमस्तुभ्यमनन्ताय दुर्वितर्क्यात्मकर्मणे।

निर्गुणाय गुणेशाय सत्त्वस्थाय च साम्प्रतम्॥ ५०

namastubhyamanantāya durvitarkyātmakarmaṇe|

nirguṇāya guṇeśāya sattvasthāya ca sāmpratam|| 50

अर्थ

जो तीनों काल और उससे परे भी एकरस स्थित हैं, जिनकी लीलाओंका रहस्य तर्क-वितर्कके परे है, जो स्वयं गुणोंसे परे रहकर भी सब गुणोंके स्वामी हैं तथा इस समय सत्त्वगुणमें स्थित हैं—ऐसे आपको हम बार-बार नमस्कार करते हैं॥ ५०॥✎ 687 688

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे-
ऽमृतमथने पञ्चमोऽध्यायः
॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #687 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #688 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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