॥ श्रीहरिः ॥
अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः।
ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः॥ ३९
avaropya giriṃ skandhāt suparṇaḥ patatāṃ varaḥ|
yayau jalānta utsṛjya hariṇā sa visarjitaḥ|| 39
अर्थ
पक्षिराज गरुड़ने समुद्रके तटपर पर्वतको उतार दिया। फिर भगवान्के विदा करनेपर गरुड़जी वहाँसे चले गये॥ ३९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धेऽमृतमथने
मन्दराचलानयनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः।
ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः॥ ३९
पक्षिराज गरुड़ने समुद्रके तटपर पर्वतको उतार दिया। फिर भगवान्के विदा करनेपर गरुड़जी वहाँसे चले गये॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 934) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/39/