श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.38

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनैकेन लीलया।

आरुह्य प्रययावब्धिं सुरासुरगणैर्वृतः॥ ३८

giriṃ cāropya garuḍe hastenaikena līlayā|

āruhya prayayāvabdhiṃ surāsuragaṇairvṛtaḥ|| 38

अर्थ

इसके बाद उन्होंने खेल-ही-खेलमें एक हाथसे उस पर्वतको उठाकर गरुड़पर रख लिया और स्वयं भी सवार हो गये। फिर देवता और असुरोंके साथ उन्होंने समुद्रतटकी यात्रा की॥ ३८॥

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