उन्होंने देखा कि देवता और असुर पर्वतके गिरनेसे पिस गये हैं। अतः उन्होंने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देवताओंको इस प्रकार जीवित कर दिया, मानो उनके शरीरमें बिलकुल चोट ही न लगी हो॥ ३७॥
गिरिपातविनिष्पिष्टान्विलोक्यामरदानवान्।
ईक्षया जीवयामास निर्जरान् निर्व्रणान्यथा॥ ३७
उन्होंने देखा कि देवता और असुर पर्वतके गिरनेसे पिस गये हैं। अतः उन्होंने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देवताओंको इस प्रकार जीवित कर दिया, मानो उनके शरीरमें बिलकुल चोट ही न लगी हो॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 934) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/6/37/