श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सुरासुरेन्द्रैर्भुजवीर्यवेपितं

परिभ्रमन्तं गिरिमङ्ग पृष्ठतः।

बिभ्रत् तदा३वर्तनमादिकच्छपो

मेनेऽङ्गकण्डूयनमप्रमेयः ॥ १०

surāsurendrairbhujavīryavepitaṃ

paribhramantaṃ girimaṅga pṛṣṭhataḥ|

bibhrat tadāvartanamādikacchapo

mene'ṅgakaṇḍūyanamaprameyaḥ || 10

अर्थ

परीक्षित्! जब बड़े-बड़े देवता और असुरोंने अपने बाहुबलसे मन्दराचलको प्रेरित किया, तब वह भगवान्‌की पीठपर घूमने लगा। अनन्त शक्तिशाली आदिकच्छप भगवान्‌को उस पर्वतका चक्कर लगाना ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई उनकी पीठ खुजला रहा हो॥ १०॥✎ 697 698 699 700 701

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—तदामन्थन०।

    (मुद्रित पृष्ठ 935)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #697 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #698 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #699 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #700 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #701 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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