श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तमुत्थितं वीक्ष्य कुलाचलं पुनः

स२मुत्थिता निर्मथितुं सुरासुराः।

दधार पृष्ठेन स लक्षयोजन-

प्रस्तारिणा द्वीप इवापरो महान्॥ ९

tamutthitaṃ vīkṣya kulācalaṃ punaḥ

samutthitā nirmathituṃ surāsurāḥ|

dadhāra pṛṣṭhena sa lakṣayojana-

prastāriṇā dvīpa ivāparo mahān|| 9

अर्थ

देवता और असुरोंने देखा कि मन्दराचल तो ऊपर उठ आया है, तब वे फिरसे समुद्र-मन्थनके लिये उठ खड़े हुए। उस समय भगवान्‌ने जम्बूद्वीपके समान एक लाख योजन फैली हुई अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण कर रखा था॥ ९॥✎ 697 698 699 700 701

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—समुद्यता।

    (मुद्रित पृष्ठ 935)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #697 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #698 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #699 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #700 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #701 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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