॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.29
मुखानि पंचोपनिषदस्तवेश
यैस्त्रिंशदष्टोत्तरमन्त्रवर्गः ।
यत् तच्छिवाख्यं परमार्थतत्त्वं१
देव स्वयंज्योतिरवस्थितिस्ते॥ २९
mukhāni paṃcopaniṣadastaveśa
yaistriṃśadaṣṭottaramantravargaḥ |
yat tacchivākhyaṃ paramārthatattvaṃ
deva svayaṃjyotiravasthitiste|| 29
अर्थ
स्वामिन्! सद्योजातादि पाँच उपनिषद् ही आपके तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान नामक पाँच मुख हैं। उन्हींके पदच्छेदसे अड़तीस कलात्मक मन्त्र निकले हैं। आप जब समस्त प्रपंचसे उपरत होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, तब उसी स्थितिका नाम होता है ‘शिव’। वास्तवमें वही स्वयंप्रकाश परमार्थतत्त्व है॥ २९॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—परमात्मतत्त्वं।