परन्तु भगवान्की यह चेष्टा दैत्यसेनापतियोंको पसंद न आयी। उन्होंने कहा कि ‘पूँछ तो साँपका अशुभ अंग है, हम उसे नहीं पकड़ेंगे॥ ३॥✎ 695
तन्नैच्छन् दैत्यपतयो महापुरुषचेष्टितम्।
न गृह्णीमो वयं पुच्छमहेरङ्गममङ्गलम्॥ ३
परन्तु भगवान्की यह चेष्टा दैत्यसेनापतियोंको पसंद न आयी। उन्होंने कहा कि ‘पूँछ तो साँपका अशुभ अंग है, हम उसे नहीं पकड़ेंगे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 934) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/7/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)