श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स्वाध्यायश्रुतसम्पन्‍नाः प्रख्याता जन्मकर्मभिः।

इति तूष्णीं स्थितान्दैत्यान् विलोक्य पुरुषोत्तमः।

स्मयमानो विसृज्याग्रं पुच्छं जग्राह सामरः॥ ४

svādhyāyaśrutasampannāḥ prakhyātā janmakarmabhiḥ|

iti tūṣṇīṃ sthitāndaityān vilokya puruṣottamaḥ|

smayamāno visṛjyāgraṃ pucchaṃ jagrāha sāmaraḥ|| 4

अर्थ

हमने वेद-शास्त्रोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया है, ऊँचे वंशमें हमारा जन्म हुआ है और वीरताके बड़े-बड़े काम हमने किये हैं। हम देवताओंसे किस बातमें कम हैं?’ यह कहकर वे लोग चुपचाप एक ओर खड़े हो गये। उनकी यह मनोवृत्ति देखकर भगवान्‌ने मुसकराकर वासुकिका मुँह छोड़ दिया और देवताओंके साथ उन्होंने पूँछ पकड़ ली॥ ४॥✎ 696

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #696 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें