वह विष जलका पाप—मल था। उसने शंकरजीपर भी अपना प्रभाव प्रकट कर दिया, उससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया, परन्तु वह तो प्रजाका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके लिये भूषणरूप हो गया॥ ४३॥✎ 706
तस्यापि दर्शयामास स्ववीर्यं जलकल्मषः।
यच्चकार गले नीलं तच्च साधोर्विभूषणम्॥ ४३
वह विष जलका पाप—मल था। उसने शंकरजीपर भी अपना प्रभाव प्रकट कर दिया, उससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया, परन्तु वह तो प्रजाका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके लिये भूषणरूप हो गया॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 941) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/7/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)