परोपकारी सज्जन प्रायः प्रजाका दुःख टालनेके लिये स्वयं दुःख झेला ही करते हैं। परन्तु यह दुःख नहीं है, यह तो सबके हृदयमें विराजमान भगवान्की परम आराधना है॥ ४४॥✎ 706
तप्यन्ते लोकतापेन साधवः प्रायशो जनाः।
परमाराधनं तद्धि पुरुषस्याखिलात्मनः॥ ४४
परोपकारी सज्जन प्रायः प्रजाका दुःख टालनेके लिये स्वयं दुःख झेला ही करते हैं। परन्तु यह दुःख नहीं है, यह तो सबके हृदयमें विराजमान भगवान्की परम आराधना है॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 941) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/7/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)