॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.9.18
तां श्रीसखीं कनककुण्डलचारुकर्ण-
नासाकपोलवदनां परदेवताख्याम्।
संवीक्ष्य सम्मुमुहुरुत्स्मितवीक्षणेन
देवासुरा विगलितस्तनपट्टिकान्ताम्॥ १८
tāṃ śrīsakhīṃ kanakakuṇḍalacārukarṇa-
nāsākapolavadanāṃ paradevatākhyām|
saṃvīkṣya sammumuhurutsmitavīkṣaṇena
devāsurā vigalitastanapaṭṭikāntām|| 18
अर्थ
सुन्दर कानोंमें सोनेके कुण्डल थे और उसकी नासिका, कपोल तथा मुख बड़े ही सुन्दर थे। स्वयं परदेवता भगवान् मोहिनीके रूपमें ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मीजीकी कोई श्रेष्ठ सखी वहाँ आ गयी हो। मोहिनीने अपनी मुसकानभरी चितवनसे देवता और दैत्योंकी ओर देखा, तो वे सब-के-सब मोहित हो गये। उस समय उनके स्तनोंपरसे अंचल कुछ खिसक गया था॥ १८॥✎ 719 720