श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.29

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयस्तत्र सुव्रताः।

दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ २९

ekadā giriśaṃ draṣṭumṛṣayastatra suvratāḥ|

diśo vitimirābhāsāḥ kurvantaḥ samupāgaman|| 29

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक दिन भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये॥ २९॥

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