श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक दिन भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये॥ २९॥
एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयस्तत्र सुव्रताः।
दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ २९
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक दिन भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.1.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 9) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/1/29/