श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

गुर्वर्थे त्यक्तराज्यो व्यचरदनुवनं

पद्मपद‍्भ्यां प्रियायाः

पाणिस्पर्शाक्षमाभ्यां मृजितपथरुजो

यो हरीन्द्रानुजाभ्याम्।

वैरूप्याच्छूर्पणख्याः प्रियविरहरुषा-

ऽऽरोपितभ्रूविजृम्भ-

त्रस्ताब्धिर्बद्धसेतुः खलदवदहनः

कोसलेन्द्रोऽवतान्‍नः ॥ ४

gurvarthe tyaktarājyo vyacaradanuvanaṃ

padmapadbhyāṃ priyāyāḥ

pāṇisparśākṣamābhyāṃ mṛjitapatharujo

yo harīndrānujābhyām|

vairūpyācchūrpaṇakhyāḥ priyaviraharuṣā-

''ropitabhrūvijṛmbha-

trastābdhirbaddhasetuḥ khaladavadahanaḥ

kosalendro'vatānnaḥ || 4

अर्थ

भगवान् श्रीरामने अपने पिता राजा दशरथके सत्यकी रक्षाके लिये राजपाट छोड़ दिया और वे वन-वनमें फिरते रहे। उनके चरणकमल इतने सुकुमार थे कि परम सुकुमारी श्रीजानकीजीके करकमलोंका स्पर्श भी उनसे सहन नहीं होता था। वे ही चरण जब वनमें चलते-चलते थक जाते, तब हनूमान् और लक्ष्मण उन्हें दबा-दबाकर उनकी थकावट मिटाते। शूर्पणखाको नाक-कान काटकर विरूप कर देनेके कारण उन्हें अपनी प्रियतमा श्रीजानकीजीका वियोग भी सहना पड़ा। इस वियोगके कारण क्रोधवश उनकी भौंहें तन गयीं, जिन्हें देखकर समुद्रतक भयभीत हो गया। इसके बाद उन्होंने समुद्रपर पुल बाँधा और लंकामें जाकर दुष्ट राक्षसोंके जंगलको दावाग्‍निके समान दग्ध कर दिया। वे कोसलनरेश हमारी रक्षा करें॥ ४॥

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