tannādriyatāgnihotryāṃ sābhilāṣaḥ sa haihayaḥ|| 25
अर्थ
वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्नि मुनिका ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा॥ २५॥
स वीरस्तत्र तद् दृष्ट्वा आत्मैश्वर्यातिशायनम्।
तन्नाद्रियताग्निहोत्र्यां साभिलाषः स हैहयः॥ २५
वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्नि मुनिका ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.15.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 78) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/15/25/
टिप्पणियाँ
२
स चैश्वर्यं तु त०।
(मुद्रित पृष्ठ 78)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#970 शब्दोंके बीचका स्थान: सवीरस्तत्र → स वीरस्तत्र