॥ श्रीहरिः ॥
व्याघ्रोऽपि वृक्णश्रवणो निस्त्रिंशाग्राहतस्ततः।
निश्चक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि समुत्सृजन्॥ ७
vyāghro'pi vṛkṇaśravaṇo nistriṃśāgrāhatastataḥ|
niścakrāma bhṛśaṃ bhīto raktaṃ pathi samutsṛjan|| 7
अर्थ
तलवारकी नोकसे बाघका भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्तेमें खून गिराता हुआ वहाँसे निकल भागा॥ ७॥
व्याघ्रोऽपि वृक्णश्रवणो निस्त्रिंशाग्राहतस्ततः।
निश्चक्राम भृशं भीतो रक्तं पथि समुत्सृजन्॥ ७
तलवारकी नोकसे बाघका भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्तेमें खून गिराता हुआ वहाँसे निकल भागा॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.2.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 12) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/7/