॥ श्रीहरिः ॥
मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन् वत्सकस्तथा।
तक्षपुष्करशालादीन् दुर्वार्क्ष्यां वृक आदधे॥ ४३
miśrakeśyāmapsarasi vṛkādīn vatsakastathā|
takṣapuṣkaraśālādīn durvārkṣyāṃ vṛka ādadhe|| 43
अर्थ
मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे वत्सकके भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृकने दुर्वाक्षीके गर्भसे तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये॥ ४३॥
मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन् वत्सकस्तथा।
तक्षपुष्करशालादीन् दुर्वार्क्ष्यां वृक आदधे॥ ४३
मिश्रकेशी अप्सराके गर्भसे वत्सकके भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृकने दुर्वाक्षीके गर्भसे तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.24.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 116) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/24/43/