परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है॥ ५७॥✎ 1396
न ह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते।
आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः॥ ५७
परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.24.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 117) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/24/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)