श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.58

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यन्मायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि।

अनुग्रहस्तन्‍निवृत्तेरात्मलाभाय चेष्यते॥ ५८

yanmāyāceṣṭitaṃ puṃsaḥ sthityutpattyapyayāya hi|

anugrahastannivṛtterātmalābhāya ceṣyate|| 58

अर्थ

उनकी मायाका विलास ही जीवके जन्म, जीवन और मृत्युका कारण है। और उनका अनुग्रह ही मायाको अलग करके आत्मस्वरूपको प्राप्त करनेवाला है॥ ५८॥✎ 1396

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1396 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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