श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

हन्तुं तमाददे वज्रं सद्योमन्युरमर्षितः।

सवज्रं स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्य भार्गवः॥ २५

hantuṃ tamādade vajraṃ sadyomanyuramarṣitaḥ|

savajraṃ stambhayāmāsa bhujamindrasya bhārgavaḥ|| 25

अर्थ

इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया॥ २५॥✎ 1632

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1632 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: चिढ़-कर → चिढ़कर

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