श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम्।

अस्तौत् समाहितमनाः प्रांजलिः प्रणतो महान्॥ २१

tatrāsīnaṃ muniṃ vīkṣya kapilākhyamadhokṣajam|

astaut samāhitamanāḥ prāṃjaliḥ praṇato mahān|| 21

अर्थ

वहीं भगवान्‌के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे। उनको देखकर उदारहृदय अंशुमान्‍ने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मनसे उनकी स्तुति की॥ २१॥

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