जब उसकी सौतोंको यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उसे भोजनके साथ गर (विष) दे दिया। परन्तु गर्भपर उस विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विषको लिये हुए ही एक बालकका जन्म हुआ जो गरके साथ पैदा होनेके कारण ‘सगर’ कहलाया। सगर बड़े यशस्वी राजा हुए॥ ४॥
आज्ञायास्यै सपत्नीभिर्गरो दत्तोऽन्धसा सह।
सह तेनैव संजातः सगराख्यो महायशाः॥ ४
जब उसकी सौतोंको यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उसे भोजनके साथ गर (विष) दे दिया। परन्तु गर्भपर उस विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विषको लिये हुए ही एक बालकका जन्म हुआ जो गरके साथ पैदा होनेके कारण ‘सगर’ कहलाया। सगर बड़े यशस्वी राजा हुए॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.8.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 41) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/8/4/