श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.50

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी।

जाताहं युवती सम्यक्प्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥ ५०

vṛndāvanaṃ punaḥ prāpya navīneva surūpiṇī|

jātāhaṃ yuvatī samyakpreṣṭharūpā tu sāmpratam|| 50

अर्थ

अब जबसे मैं वृन्दावन आयी, तबसे पुनः परम सुन्दरी सुरूपवती नवयुवती हो गयी हूँ॥ ५०॥

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