॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.2.17
न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वासुरोऽपि वा।
भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत्॥ १७
na preto na piśāco vā rākṣaso vāsuro'pi vā|
bhaktiyuktamanaskānāṃ sparśane na prabhurbhavet|| 17
अर्थ
जिनके हृदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते॥ १७॥