॥ श्रीहरिः ॥
मनोवृत्तिजयश्चैव नियमाचरणं तथा।
दीक्षा कर्तुमशक्यत्वात्सप्ताहश्रवणं मतम्॥ ४७
manovṛttijayaścaiva niyamācaraṇaṃ tathā|
dīkṣā kartumaśakyatvātsaptāhaśravaṇaṃ matam|| 47
अर्थ
कलियुगमें बहुत दिनोंतक चित्तकी वृत्तियोंको वशमें रखना, नियमोंमें बँधे रहना और किसी पुण्यकार्यके लिये दीक्षित रहना कठिन है; इसलिये सप्ताहश्रवणकी विधि है॥ ४७॥
मनोवृत्तिजयश्चैव नियमाचरणं तथा।
दीक्षा कर्तुमशक्यत्वात्सप्ताहश्रवणं मतम्॥ ४७
कलियुगमें बहुत दिनोंतक चित्तकी वृत्तियोंको वशमें रखना, नियमोंमें बँधे रहना और किसी पुण्यकार्यके लिये दीक्षित रहना कठिन है; इसलिये सप्ताहश्रवणकी विधि है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 51) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/3/47/