जिसमें पुत्र-स्त्री आदिका सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोकमें सरस तो पुत्र-पौत्रादिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है॥ ३८॥
पुत्रादिसुखहीनोऽयं संन्यासः शुष्क एव हि।
गृहस्थः सरसो लोके पुत्रपौत्रसमन्वितः॥ ३८
जिसमें पुत्र-स्त्री आदिका सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोकमें सरस तो पुत्र-पौत्रादिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 57) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/38/