‘शुकस्वरूप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें’॥ ३३॥✎ 1570
शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय॥ ३३
‘शुकस्वरूप भगवन्! आप समझानेकी कलामें कुशल और सब शास्त्रोंमें पारंगत हैं; कृपया इस कथाको प्रकाशित करके मेरा अज्ञान दूर करें’॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 73) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/6/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)