अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये ॥ ७३॥
नारदश्च कृतार्थोऽभूत्सिद्धे स्वीये मनोरथे।
पुलकीकृतसर्वाङ्गः परमानन्दसम्भृतः॥ ७३
अपना मनोरथ पूरा होनेसे नारदजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई, उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे परमानन्दसे पूर्ण हो गये ॥ ७३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.73 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 76) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/6/73/