किन्त्वेका परमा चिन्ता तत्र किंचिद् विचार्यताम्॥ १४
tasmānnālpāpi me cintā kṣātraṃ dṛḍhamupeyuṣaḥ|
kintvekā paramā cintā tatra kiṃcid vicāryatām|| 14
अर्थ
इसलिये मुझे किसी बातकी तनिक भी चिन्ता नहीं है; क्योंकि उनकी कृपासे मैं क्षत्रियोचित शूरवीरतासे भलीभाँति सम्पन्न हूँ। मुझे केवल एक बातकी बहुत बड़ी चिन्ता है, आप उसके सम्बन्धमें कुछ विचार कीजिये॥ १४॥
तस्मान्नाल्पापि मे चिन्ता क्षात्रं दृढमुपेयुषः।
किन्त्वेका परमा चिन्ता तत्र किंचिद् विचार्यताम्॥ १४
इसलिये मुझे किसी बातकी तनिक भी चिन्ता नहीं है; क्योंकि उनकी कृपासे मैं क्षत्रियोचित शूरवीरतासे भलीभाँति सम्पन्न हूँ। मुझे केवल एक बातकी बहुत बड़ी चिन्ता है, आप उसके सम्बन्धमें कुछ विचार कीजिये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 985) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/1/14/