श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.1.15

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

माथुरे त्वभिषिक्तोऽपि स्थितोऽहं निर्जने वने।

क्व गता वै प्रजात्रत्या यत्र राज्यं प्ररोचते॥ १५

māthure tvabhiṣikto'pi sthito'haṃ nirjane vane|

kva gatā vai prajātratyā yatra rājyaṃ prarocate|| 15

अर्थ

यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्यपर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है, जब प्रजा रहे’॥ १५॥

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