॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.3.31
भोगार्थिभ्यस्तु यज्ञादिफलं दास्यामि निश्चितम्।
मोक्षार्थिभ्यो विरक्तेभ्यो मुक्तिं पञ्चविधां तथा॥ ३१
bhogārthibhyastu yajñādiphalaṃ dāsyāmi niścitam|
mokṣārthibhyo viraktebhyo muktiṃ pañcavidhāṃ tathā|| 31
अर्थ
जो भोगोंकी इच्छा रखनेवाले हैं, उन्हें अवश्य ही उनके किये हुए यज्ञादि कर्मोंका फल अर्पण करूँगा; तथा जो संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, विरक्त हैं, उन्हें उनके इच्छानुसार पाँच प्रकारकी मुक्ति भी देता रहूँगा॥ ३१॥