॥ श्रीहरिः ॥
अहं तु समनुग्राह्यस्तव पादतले श्रितः।
मैं भी आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ, अतः मुझपर भी आपको अनुग्रह करना चाहिये।
सूत उवाच
श्रुत्वैतद् वचनं भूयोऽप्युद्धवस्तमुवाच ह॥ ५९
ahaṃ tu samanugrāhyastava pādatale śritaḥ|
śrutvaitad vacanaṃ bhūyo'pyuddhavastamuvāca ha|| 59
अर्थ
मैं भी आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ, अतः मुझपर भी आपको अनुग्रह करना चाहिये।
अहं तु समनुग्राह्यस्तव पादतले श्रितः।
श्रुत्वैतद् वचनं भूयोऽप्युद्धवस्तमुवाच ह॥ ५९
मैं भी आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ, अतः मुझपर भी आपको अनुग्रह करना चाहिये।
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1000) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/3/59/