श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

आमन्त्र्य चाभ्यनुज्ञातः परिष्वज्याभिवाद्य तम्।

आरुरोह रथं कैश्चित्परिष्वक्तोऽभिवादितः॥ ८

āmantrya cābhyanujñātaḥ pariṣvajyābhivādya tam|

āruroha rathaṃ kaiścitpariṣvakto'bhivāditaḥ|| 8

अर्थ

फिर जब उन्होंने राजा युधिष्ठिरसे द्वारका जानेकी अनुमति माँगी तब राजाने उन्हें अपने हृदयसे लगाकर स्वीकृति दे दी। भगवान् उनको प्रणाम करके रथपर सवार हुए। कुछ लोगों (समान उम्रवालों)-ने उनका आलिंगन किया और कुछ (छोटी उम्रवालों)-ने प्रणाम॥ ८॥✎ 75 76

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #75 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखते → को देखते
  • #76 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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