॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.14.41
कच्चित्त्वं ब्राह्मणं बालं गां वृद्धं रोगिणं स्त्रियम्।
शरणोपसृतं सत्त्वं नात्याक्षीः शरणप्रदः॥ ४१
kaccittvaṃ brāhmaṇaṃ bālaṃ gāṃ vṛddhaṃ rogiṇaṃ striyam|
śaraṇopasṛtaṃ sattvaṃ nātyākṣīḥ śaraṇapradaḥ|| 41
अर्थ
तुम सदा शरणागतोंकी रक्षा करते आये हो; कहीं किसी भी ब्राह्मण, बालक, गौ, बूढ़े, रोगी, अबला अथवा अन्य किसी प्राणीका, जो तुम्हारी शरणमें आया हो, तुमने त्याग तो नहीं कर दिया?॥ ४१॥✎ 1859