कहीं किसीने दुर्भावपूर्ण अमंगल शब्द आदिके द्वारा तुम्हारा चित्त तो नहीं दुखाया? अथवा किसी आशासे तुम्हारे पास आये हुए याचकोंको उनकी माँगी हुई वस्तु अथवा अपनी ओरसे कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके भी तुम नहीं दे सके?॥ ४०॥✎ 1859
कच्चिन्नाभिहतोऽभावैः शब्दादिभिरमङ्गलैः।
न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम्॥ ४०
कहीं किसीने दुर्भावपूर्ण अमंगल शब्द आदिके द्वारा तुम्हारा चित्त तो नहीं दुखाया? अथवा किसी आशासे तुम्हारे पास आये हुए याचकोंको उनकी माँगी हुई वस्तु अथवा अपनी ओरसे कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके भी तुम नहीं दे सके?॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 149) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/14/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)