भाई अर्जुन! यह भी बताओ कि तुम स्वयं तो कुशलसे हो न? मुझे तुम श्रीहीन-से दीख रहे हो; वहाँ बहुत दिनोंतक रहे, कहीं तुम्हारे सम्मानमें तो किसी प्रकारकी कमी नहीं हुई? किसीने तुम्हारा अपमान तो नहीं कर दिया?॥ ३९॥✎ 1859
कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे।
अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः॥ ३९
भाई अर्जुन! यह भी बताओ कि तुम स्वयं तो कुशलसे हो न? मुझे तुम श्रीहीन-से दीख रहे हो; वहाँ बहुत दिनोंतक रहे, कहीं तुम्हारे सम्मानमें तो किसी प्रकारकी कमी नहीं हुई? किसीने तुम्हारा अपमान तो नहीं कर दिया?॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 149) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/14/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)