श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अपि स्वित्पर्यभुङ्‌क्थास्त्वं सम्भोज्यान् वृद्धबालकान्।

जुगुप्सितं कर्म किञ्चित्कृतवान्‍न यदक्षमम्॥ ४३

api svitparyabhuṅkthāstvaṃ sambhojyān vṛddhabālakān|

jugupsitaṃ karma kiñcitkṛtavānna yadakṣamam|| 43

अर्थ

अथवा भोजन करानेयोग्य बालक और बूढ़ोंको छोड़कर तुमने अकेले ही तो भोजन नहीं कर लिया? मेरा विश्वास है कि तुमने ऐसा कोई निन्दित काम तो नहीं किया होगा, जो तुम्हारे योग्य न हो॥ ४३॥✎ 1859

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1859 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४३़॥ → ४३॥

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