श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.44

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कच्चित् प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना।

शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक्॥ ४४

kaccit preṣṭhatamenātha hṛdayenātmabandhunā|

śūnyo'smi rahito nityaṃ manyase te'nyathā na ruk|| 44

अर्थ

हो-न-हो अपने परम प्रियतम अभिन्‍नहृदय परम सुहृद‍् भगवान् श्रीकृष्णसे तुम रहित हो गये हो। इसीसे अपनेको शून्य मान रहे हो। इसके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं हो सकता, जिससे तुमको इतनी मानसिक पीड़ा हो॥ ४४॥✎ 1859

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
युधिष्ठिरवितर्को नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1859 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४३़॥ → ४३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें