शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक्॥ ४४
kaccit preṣṭhatamenātha hṛdayenātmabandhunā|
śūnyo'smi rahito nityaṃ manyase te'nyathā na ruk|| 44
अर्थ
हो-न-हो अपने परम प्रियतम अभिन्नहृदय परम सुहृद् भगवान् श्रीकृष्णसे तुम रहित हो गये हो। इसीसे अपनेको शून्य मान रहे हो। इसके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं हो सकता, जिससे तुमको इतनी मानसिक पीड़ा हो॥ ४४॥✎ 1859
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे युधिष्ठिरवितर्को नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
कच्चित् प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना।
शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक्॥ ४४
हो-न-हो अपने परम प्रियतम अभिन्नहृदय परम सुहृद् भगवान् श्रीकृष्णसे तुम रहित हो गये हो। इसीसे अपनेको शून्य मान रहे हो। इसके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं हो सकता, जिससे तुमको इतनी मानसिक पीड़ा हो॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 150) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/14/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)