उनका शरीर बिखरी हुई जटाओंसे और कृष्ण मृगचर्मसे ढका हुआ था। राजा परीक्षित्ने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्योंकि प्याससे उनका गला सूखा जा रहा था॥ २७॥
विप्रकीर्णजटाच्छन्नं रौरवेणाजिनेन च।
विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत॥ २७
उनका शरीर बिखरी हुई जटाओंसे और कृष्ण मृगचर्मसे ढका हुआ था। राजा परीक्षित्ने ऐसी ही अवस्थामें उनसे जल माँगा, क्योंकि प्याससे उनका गला सूखा जा रहा था॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 171) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/18/27/