जब राजाको वहाँ बैठनेके लिये तिनकेका आसन भी न मिला, किसीने उन्हें भूमिपर भी बैठनेको न कहा—अर्घ्य और आदरभरी मीठी बातें तो कहाँसे मिलतीं—तब अपनेको अपमानित-सा मानकर वे क्रोधके वश हो गये॥ २८॥
अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्घ्यसूनृतः।
अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्चुकोप ह॥ २८
जब राजाको वहाँ बैठनेके लिये तिनकेका आसन भी न मिला, किसीने उन्हें भूमिपर भी बैठनेको न कहा—अर्घ्य और आदरभरी मीठी बातें तो कहाँसे मिलतीं—तब अपनेको अपमानित-सा मानकर वे क्रोधके वश हो गये॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 171) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/18/28/