श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्घ्यसूनृतः।

अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्चुकोप ह॥ २८

alabdhatṛṇabhūmyādirasamprāptārghyasūnṛtaḥ|

avajñātamivātmānaṃ manyamānaścukopa ha|| 28

अर्थ

जब राजाको वहाँ बैठनेके लिये तिनकेका आसन भी न मिला, किसीने उन्हें भूमिपर भी बैठनेको न कहा—अर्घ्य और आदरभरी मीठी बातें तो कहाँसे मिलतीं—तब अपनेको अपमानित-सा मानकर वे क्रोधके वश हो गये॥ २८॥

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