श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः।

ब्राह्मणं प्रत्यभूद् ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च॥ २९

abhūtapūrvaḥ sahasā kṣuttṛḍbhyāmarditātmanaḥ|

brāhmaṇaṃ pratyabhūd brahman matsaro manyureva ca|| 29

अर्थ

शौनकजी! वे भूख-प्याससे छटपटा रहे थे, इसलिये एकाएक उन्हें ब्राह्मणके प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो आया। उनके जीवनमें इस प्रकारका यह पहला ही अवसर था॥ २९॥

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