॥ श्रीहरिः ॥
स१ तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा।
विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागमत्२॥ ३०
sa tu brahmaṛṣeraṃse gatāsumuragaṃ ruṣā|
vinirgacchandhanuṣkoṭyā nidhāya puramāgamat|| 30
अर्थ
वहाँसे लौटते समय उन्होंने क्रोधवश धनुषकी नोकसे एक मरा साँप उठाकर ऋषिके गलेमें डाल दिया और अपनी राजधानीमें चले आये॥ ३०॥
स तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा।
विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागमत्॥ ३०
वहाँसे लौटते समय उन्होंने क्रोधवश धनुषकी नोकसे एक मरा साँप उठाकर ऋषिके गलेमें डाल दिया और अपनी राजधानीमें चले आये॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 172) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/30/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—तस्य ब्रह्मर्षरंसे।
(मुद्रित पृष्ठ 172) - २
प्रा० पा०—मागतः।
(मुद्रित पृष्ठ 172)