श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तत्र गत्वा जगन्‍नाथं देवदेवं वृषाकपिम्।

पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहितः॥ २०

tatra gatvā jagannāthaṃ devadevaṃ vṛṣākapim|

puruṣaṃ puruṣasūktena upatasthe samāhitaḥ|| 20

अर्थ

भगवान् देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। वे अपने भक्तोंकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते और उनके समस्त क्लेशोंको नष्ट कर देते हैं। वे ही जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। क्षीरसागरके तटपर पहुँचकर ब्रह्मा आदि देवताओंने ‘पुरुषसूक्त’ के द्वारा उन्हीं परम पुरुष सर्वान्तर्यामी प्रभुकी स्तुति की। स्तुति करते-करते ब्रह्माजी समाधिस्थ हो गये॥ २०॥

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