श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पुरैव पुंसावधृतो धराज्वरो

भवद्भिरंशैर्यदुषूपजन्यताम् ।

स यावदुर्व्या भरमीश्‍वरेश्‍वरः

स्वकालशक्त्या क्षपयंश्‍चरेद् भुवि॥ २२

puraiva puṃsāvadhṛto dharājvaro

bhavadbhiraṃśairyaduṣūpajanyatām |

sa yāvadurvyā bharamīśvareśvaraḥ

svakālaśaktyā kṣapayaṃścared bhuvi|| 22

अर्थ

भगवान्‌को पृथ्वीके कष्टका पहलेसे ही पता है। वे ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। अतः अपनी कालशक्तिके द्वारा पृथ्वीका भार हरण करते हुए वे जबतक पृथ्वीपर लीला करें, तबतक तुम लोग भी अपने-अपने अंशोंके साथ यदुकुलमें जन्म लेकर उनकी लीलामें सहयोग दो॥ २२॥

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