॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.17.6
तमापतन्तं तरसा विषायुधः
प्रत्यभ्ययादुच्छ्रितनैकमस्तकः ।
दद्भिः सुपर्णं व्यदशद् ददायुधः
करालजिह्वोच्छ्वसितोग्रलोचनः ॥ ६
tamāpatantaṃ tarasā viṣāyudhaḥ
pratyabhyayāducchritanaikamastakaḥ |
dadbhiḥ suparṇaṃ vyadaśad dadāyudhaḥ
karālajihvocchvasitogralocanaḥ || 6
अर्थ
विषधर कालिय नागने जब देखा कि गरुड बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण करने आ रहे हैं, तब वह अपने एक सौ एक फण फैलाकर डसनेके लिये उनपर टूट पड़ा। उसके पास शस्त्र थे केवल दाँत, इसलिये उसने दाँतोंसे गरुडको डस लिया। उस समय वह अपनी भयावनी जीभें लपलपा रहा था, उसकी साँस लंबी चल रही थी और आँखें बड़ी डरावनी जान पड़ती थीं॥ ६॥