जब योगमायाने देवकीका गर्भ ले जाकर रोहिणीके उदरमें रख दिया, तब पुरवासी बड़े दुःखके साथ आपसमें कहने लगे—‘हाय! बेचारी देवकीका यह गर्भ तो नष्ट ही हो गया’॥ १५॥
गर्भे प्रणीते देवक्या रोहिणीं योगनिद्रया।
अहो विस्रंसितो गर्भ इति पौरा विचुक्रुशुः॥ १५
जब योगमायाने देवकीका गर्भ ले जाकर रोहिणीके उदरमें रख दिया, तब पुरवासी बड़े दुःखके साथ आपसमें कहने लगे—‘हाय! बेचारी देवकीका यह गर्भ तो नष्ट ही हो गया’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.2.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 129) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/2/15/