॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.29.25
दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा।
पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी॥ २५
duḥśīlo durbhago vṛddho jaḍo rogyadhano'pi vā|
patiḥ strībhirna hātavyo lokepsubhirapātakī|| 25
अर्थ
जिन स्त्रियोंको उत्तम लोक प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, वे पातकीको छोड़कर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो॥ २५॥✎ 1818